SIP vs Lump sum: भारत के बेंचमार्क इंडेक्स 27 नवंबर को नई चमकदार ऊंचाइयों पर पहुंच गए। इससे निवेश का माहौल रोमांचक तो दिख रहा, लेकिन उतना ही अनिश्चित भी। इस साल लगातार मजबूत आर्थिक संकेतों के बीच BSE सेंसेक्स और निफ्टी 50 दोनों नए ऑल-टाइम हाई पर पहुंचे।
लेकिन इस उत्साह के बीच एक पुराना सवाल फिर खड़ा होता है, क्या ऐसे ऊंचे वैल्यूएशन पर एकमुश्त (लंप सम) निवेश करना ठीक है, या हर महीने SIP से धीरे-धीरे मार्केट में एंट्री करना ज्यादा समझदारी है? आइए समझते हैं कि कौन सा विकल्प ज्यादा बेहतर है।
लंप सम के पक्ष में गणित
गणित का सीधा नियम साफ है- लंप सम निवेश आगे रहता है, क्योंकि पूरी रकम पहले दिन से कंपाउंड होती है। इसकी वजह से SIP के मुकाबले यह लंबे समय तक रिटर्न को तेज बनाता है।
उदाहरण के तौर पर, 10%, 12% और 15% वार्षिक रिटर्न मानें। दोनों ही रणनीतियों में सालाना निवेश 1.2 लाख रुपये है- लंप सम एक बार में और SIP के तौर पर 10,000 रुपये हर महीने। नीचे टेबल साफ दिखाती है कि लंबे कंपाउंडिंग समय की वजह से लंप सम की बढ़त रहती है।

Wise Finserv की डायरेक्टर और COO चारू पाहुजा कहती हैं, 'लंप सम को नैचुरल मैथमैटिकल एडवांटेज मिलता है क्योंकि पैसा पूरे साल इन्वेस्ट रहता है और लंबे समय तक कंपाउंड होता है।' लेकिन यह तभी होता है जब बाजार लगातार ऊपर जाएं, जो कि असल इक्विटी मार्केट में बहुत कम होता है।
वोलैटाइल मार्केट में SIP का फायदा
Scripbox के फाउंडर और CEO अतुल शिंगल बताते हैं कि इस गणित में एक बड़ा जोखिम छिपा रहता है- सीक्वेंस रिस्क। अगर लंप सम निवेश के तुरंत बाद बाजार 20-40% गिर जाए, तो पूरी लॉन्ग-टर्म कमाई कमजोर हो सकती है।
उनका कहना है, 'अगर निवेश के तुरंत बाद बड़ी गिरावट आती है, तो लंप सम का लंबी अवधि का रिटर्न तेजी से गिर जाता है।' Nifty 50 TRI के रियल डेटा में दिखता है कि बुल मार्केट में लंप सम चमकता है, लेकिन अस्थिर शुरुआत वाले सालों में SIP तेजी से अंतर भर देता है।
चारू पाहुजा जोड़ती हैं, 'SIP को वोलैटिलिटी से फायदा मिलता है, क्योंकि जब कीमतें गिरती हैं तो ज्यादा यूनिट मिलती हैं।' 2008 की मंदी और 2020 के कोविड क्रैश में, गिरावट के दौरान खरीदी गई यूनिट्स ने आने वाले वर्षों में SIP रिटर्न को काफी बढ़ा दिया।
SIP ज्यादा बेहतर विकल्प क्यों
ज्यादातर सैलरीड लोग महीने-महीने की आय से निवेश करते हैं। ऐसे में SIP उनकी इनकम पैटर्न से पूरी तरह मेल खाती है। यह निवेशक को अनुशासन में रखती है और मार्केट टाइमिंग के तनाव से बचाती है।
शिंगल बताते हैं, 'SIP लंबी अवधि में अपने-आप वेल्थ बनाती है, खासकर उस माहौल में जहां 10-20% गिरावट आम बात है।'

कब लंप सम बेहतर साबित होता है
फिर भी लंप सम कुछ खास परिस्थितियों में बहुत फायदेमंद होता है।
- जब बाजार में हाल ही में तेज गिरावट आई हो।
- बोनस, इनहेरिटेंस या किसी विंडफॉल के रूप में बड़ी रकम मिली हो।
- निवेशक की जोखिम लेने की क्षमता ज्यादा हो।
- निवेश अवधि 15 साल या उससे अधिक हो।
शिंगल कहते हैं, 'लंप सम तब सबसे अच्छा काम करता है, जब बाजार वैल्यूएशन उचित या सस्ते हों और निवेशक का रिस्क प्रोफाइल मजबूत हो।'
निवेश की सबसे बेहतर रणनीति क्या है?
निवेश करने का सबसे व्यावहारिक तरीका वह होता है जो अनुशासन और मौके- दोनों का फायदा दिलाए। यही काम करती है हाइब्रिड रणनीति, जिसमें SIP, लंप सम और SIP टॉप-अप तीनों को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है।
इस मॉडल में SIP आपकी मुख्य ताकत होती है, जो हर महीने नियमित निवेश सुनिश्चित करती है। इससे वेल्थ धीरे-धीरे और स्थिर तरीके से बनती रहती है, चाहे बाजार ऊपर जाए या नीचे।
फिर, जब भी बाजार में गिरावट आए या आपके पास बोनस, इंसेंटिव या अतिरिक्त रकम आए, तो लंप सम निवेश करके आप तुरंत उपलब्ध मौकों का फायदा उठा सकते हैं। इससे पोर्टफोलियो को अतिरिक्त बढ़त मिल जाती है।

हर साल SIP बढ़ाना जरूरी
चारू पाहुजा इस पर जोर देती हैं कि हर साल अपनी SIP बढ़ाना बेहद जरूरी है, क्योंकि आपकी आय जैसे-जैसे बढ़ती है, निवेश की गति भी उसी अनुपात में तेज हो जानी चाहिए। इससे लंबे समय में वेल्थ क्रिएशन काफी तेज हो जाता है।
अतुल शिंगल बताते हैं कि यह हाइब्रिड तरीका दो बड़े फायदे देता है। पहला, टाइमिंग का जोखिम कम करता है, क्योंकि आपका कुछ निवेश हमेशा SIP के जरिए चलता रहता है। दूसरा, एंट्री प्राइस को संतुलित करता है, क्योंकि लंप सम केवल तब लगाया जाता है जब बाजार अच्छी वैल्यू दे रहा हो। कुल मिलाकर, यह रणनीति आपको बाजार की उतार-चढ़ाव में फंसने नहीं देती, बल्कि हर परिस्थिति में आपका फायदा सुनिश्चित करती है।
SIP vs lumpsum: SIP या लंपसम... किस तरीके से बनेगा बड़ा फंड? जानिए एक्सपर्ट से
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