Fuel Prices Surging: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा का संकट गहरा गया है। जहां अमेरिका से लेकर वियतनाम तक पेट्रोल की कीमतें 70% तक बढ़ गई हैं, वहीं भारत में पिछले तीन हफ्तों के दौरान पंपों पर कीमतें जस की तस बनी हुई हैं। आखिर वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत यह स्थिरता कैसे बनाए हुए है?
95 देशों में बढ़े फ्यूल के दाम
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई बाधित हुई है, जिसका असर पूरी दुनियाभर में देखने को मिल रहा है। कंबोडिया में फ्यूल की कीमतें 67.8%, वियतनाम में 49.7% और नाइजीरिया में 35% तक बढ़ चुकी हैं। अमेरिका में पेट्रोल के दाम 16.5% बढ़े हैं, जहां कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में यह $5 प्रति गैलन के पार पहुंच गया है। जर्मनी और फ्रांस में भी भारी इजाफा देखा गया है। पाकिस्तान में तेल बचाने के लिए '4-डे वर्किंग वीक' लागू किया गया है, जबकि बांग्लादेश में ऊर्जा संरक्षण के लिए यूनिवर्सिटीज बंद कर दी गई हैं।
भारत में क्यों 'फ्रीज' हैं कीमतें?
जबकि दुनिया भर में कीमतें हर दिन बदल रही हैं, भारत के प्रमुख शहरों दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर हैं। इसके ये 3 प्रमुख कारण है:
एडमिनिस्ट्रेटिव कंट्रोल: भारत में तेल की कीमतें पूरी तरह से 'रियल-टाइम' मार्केट पर निर्भर नहीं हैं। यही वजह है कि सरकार और सरकारी तेल विपणन कंपनियां (OMCs) अक्सर अल्पकालिक झटकों को सोख लेती हैं।
टैक्स स्ट्रक्चर में लचीलापन: सरकार के पास एक्साइज ड्यूटी या वैट (VAT) में बदलाव कर कीमतों को नियंत्रित रखने का विकल्प होता है।
OMC का बफर: भारतीय तेल कंपनियां वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का बोझ तुरंत ग्राहकों पर नहीं डालतीं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार और घरेलू पंप की कीमतों के बीच 'बड़ा अंतर' देखने को मिलता है।
क्या यह स्थिरता हमेशा बनी रहेगी?
जानकारों का मानना है कि भारत के लिए यह स्थिति लंबे समय तक बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल $100-110 के पार बना रहता है, तो तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) का घाटा बढ़ेगा, जिसे अंततः कीमतों में बढ़ोतरी या सरकारी सब्सिडी के जरिए ही भरा जा सकेगा।
महंगाई का 'ट्रिपल' अटैक
तेल की कीमतों में यह वैश्विक उछाल केवल वाहनों तक सीमित नहीं रहेगा, इसके तीन और खतरनाक प्रभाव होंगे:
ट्रांसपोर्ट: माल ढुलाई महंगी होने से हर छोटी-बड़ी चीज की कीमत बढ़ेगी।
खेती: फर्टिलाइजर उत्पादन महंगा होने से अनाज के दाम बढ़ेंगे।
मैन्युफैक्चरिंग: फैक्ट्रियों में लागत बढ़ने से सामान की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे 1973 और 2008 जैसी वैश्विक मंदी का खतरा पैदा हो सकता है।
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