Thursday, January 8, 2026

Tax old regime vs new regime: इनवेस्टमेंट प्रूफ सब्मिट करते समय एंप्लॉयीज को किस ऑप्शन को सेलेक्ट करना चाहिए?

कंपनियों ने एंप्लॉयीज से फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के इनवेस्टमेंट प्रूफ मांगने शुरू कर दिए हैं। सवाल है कि एंप्लॉयी को ओल्ड रीजीम में बने रहना चाहिए या नई रीजीम में शिफ्ट करना चाहिए? इसका असर फाइनेंशियल ईयर के दौरान एंप्लॉयी के टैक्स कैलकुलेशन पर पड़ता है। कंपनी का फाइनेंस डिपार्टमेंट इसी आधार पर हर महीने एंप्लॉयी की सैलरी से टीडीएस काटता है।

जब कोई एंप्लॉयी ओल्ड टैक्स रीजीम को सेलेक्ट करता है तो एंप्लॉयर उसके एग्जेम्प्शन और डिडक्शन को ध्यान में रखते हुए टीडीएस काटता है। ओल्ड रीजीम में टैक्सपेयर्स को कई तरह के एग्जेम्प्शन और डिडक्शंस मिलते हैं। इनमें सेक्शन 80सी, सेक्शन 80डी और होम लोन पर मिलने वाले डिडक्शंस शामिल हैं। नई रीजीम में टैक्सपेयर्स को ये डिडक्शंस और एग्जेम्प्शंस नहीं मिलते हैं।

एन ए शाह एसोसिएट्स के पार्टनर (टैक्स) गोपाल बोहरा ने कहा, "नई टैक्स रीजीम में टैक्सपेयर्स को 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है। टैक्स के रेट्स भी कम हैं। पुरानी रीजीम में FY2025-26 में कुल 25 लाख रुपये की इनकम वाले सैलरीड टैक्सपेयर अगर कुल 8 लाख रुपये तक का डिडक्शन क्लेम करता है तभी उसे फायदा है।" इसका मतलब है कि अगर टैक्सपेयर्स का कुल डिडक्शन 8 लाख रुपये से कम है तो उसके लिए नई रीजीम सही रहेगी।

नई टैक्स रीजीम में सालाना 12 लाख रुपये तक की इनकम पर टैक्स नहीं लगता है। 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है। प्रोविडेंट फंड और एनपीएस अकाउंट में एंप्लॉयर के कंट्रिब्यूशन पर टैक्स बेनेफिट्स मिलता है। सैलरीड टैक्सपेयर्स की इनकम सालाना 12.75 लाख रुपये से ज्यादा होने पर उसे स्लैब रेट के हिसाब से टैक्स चुकाना पड़ता है।

ओल्ड रीजीम उन एंप्लॉयीज के लिए फायदेमंद है, जो हर महीने कुछ खास तरह का खर्च करते हैं। इसमें घर का रेंट, होम लोन की ईएमआई, टैक्स सेविंग्स इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश आदि शामिल हैं। इससे ज्यादा टैक्स रेट्स की वजह से होने वाला नुकसान न्यूट्रल हो जाता है।

जो एंप्लॉयीज डिडक्शन क्लेम नहीं करते या कम डिडक्शन क्लेम करते हैं, उनकी दिलचस्पी नई रीजीम में बढ़ रही है। बॉम्बे अकाउंटेंट्स सोसायटी के सीए और ज्वाइंट सेक्रेटरी मृणाल मेहता ने कहा, "नई रीजीम उन एंप्लॉयीज के लिए अच्छा है जो डिडक्शंस और एग्जेम्प्शंस का बेनेफिट क्लेम नहीं करते हैं। नई रीजीम में कम टैक्स स्लैब्स की वजह से उनकी काफी बचत हो जाती है।"

ओल्ड टैक्स रीजीम का इस्तेमाल करने वाले टैक्सपेयर्स को अपने क्लेम के सपोर्ट में डॉक्युमेंट्स सब्मिट करना पड़ता है। कंपनी निम्निलिखित डॉक्युमेंट्स मांगती है:

-हाउस रेंट अलाउन्स (एचआरए)

--रेंट रिसीट्स

--रेंट एग्रीमेंट्स

--मकानमालिक का पैन (अगर सालाना रेंट 1 लाख रुपये से ज्यादा)

-सेक्शन 80सी इनवेस्टमेंट्स (1.5 लाख रुपये तक)

--प्रोविडेंट फंड कंट्रिब्यूशन स्टेटमेंट

--लाइफ इंश्योरेंस प्रीमियम रिसीट्स

--ईएलएसएस म्यूचुअल फंड इनवेस्टमेंट प्रूफ

--पीपीएफ डिपॉजिट रिसीट्स

--बच्चों की ट्यूशन फीस की रिसीट्स

-हेल्थ इंश्योरेंस (सेक्शन 80डी)

--हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पेमेंट रिसीट्स

-होम लोन बेनेफिट्स

--बैंक का इंटरेस्ट पेमेंट सर्टिफिकेट

--प्रिंसिपल पेमेंट सर्टिफिकेट (सेक्शन 80सी के तहत क्लेम करने पर)

-लीव ट्रैवल अलाउन्स (LTA)

--ट्रैवल टिकट्स या बोर्डिंग पास

-- प्रूफ ऑफ ट्रैवल एक्सपेंसेज (कंपनी की पॉलिसी के मुताबिक)

-अन्य डिडक्शंस

--एजुकेशन लोन इंटरेस्ट सर्टिफिकेट

--सेक्शन 80जी के तहत एलिजिबल डोनेशंस

नई इनकम टैक्स रीजीम का इस्तेमाल करने वाले टैक्सपेयर्स को ये प्रूफ सब्मिट करने की जरूरत नहीं पड़ती है। इसकी वजह यह है कि कंपनी का फाइनेंस डिपार्टमेंट टीडीएस काटते वक्त डिडक्शंस और एग्जेम्प्शंस पर विचार नहीं करता है।

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नई रीजीम में सिर्फ सिर्फ सेक्शन 80सीसीडी (2) के तहत एंप्लॉयर के 14 फीसदी तक के कंट्रिब्यूशन और किराए पर दिए गए घर के होम लोन के इंटरेस्ट पर डिडक्शन क्लेम किया जा सकता है।



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