इंश्योरेंस खरीदना अक्सर लोगों के लिए औपचारिकता जैसा लगता है। लंबा फॉर्म, कई सवाल और यह सोच कि ‘थोड़ा बहुत छुपा लेंगे तो क्या फर्क पड़ेगा’। लेकिन सच्चाई यह है कि इंश्योरेंस फॉर्म में गलत या अधूरी जानकारी देना भविष्य में भारी मुसीबत का कारण बन सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब आप पॉलिसी लेते हैं, तो कंपनी आपके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर जोखिम का आकलन करती है। अगर आपने अपनी मेडिकल हिस्ट्री, धूम्रपान की आदत या किसी गंभीर बीमारी को छुपाया, तो क्लेम के समय कंपनी इसे धोखाधड़ी मान सकती है। नतीजा क्लेम रिजेक्ट या लंबी देरी। वहीं अगर आप शुरुआत में ही सच बता दें, तो कंपनी पॉलिसी में कुछ बदलाव कर सकती है, जैसे प्रीमियम थोड़ा बढ़ाना या कुछ शर्तें जोड़ना। लेकिन इससे आपका क्लेम सुरक्षित रहता है और मानसिक शांति भी मिलती है।
IRDAI नियमों के तहत फ्रॉड साबित होने पर क्लेम रिजेक्ट, पॉलिसी कैंसल, प्रीमियम रिफंड तक नहीं मिलता है। 3 साल जेल के लिए कानूनी सजा भी हो सकती है या 10 लाख जुर्माना देना पड़ सकता है। छोटी झूठ भी धारा 420 (चोरी) या फॉर्जरी के दायरे में आ सकती है। अस्पताल ब्लैकलिस्ट हो सकते हैं।
मान लीजिए, राजेश नाम का व्यक्ति हेल्थ इंश्योरेंस लेते समय अपनी डायबिटीज की जानकारी छुपा लेता है। कुछ साल बाद जब उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और क्लेम किया, तो इंश्योरेंस कंपनी ने मेडिकल रिकॉर्ड देखकर पाया कि उसने फॉर्म में गलत जानकारी दी थी। परिणामस्वरूप उसका क्लेम रिजेक्ट हो गया। अगर राजेश ने शुरुआत में ही सच बताया होता, तो शायद उसे थोड़ा ज्यादा प्रीमियम देना पड़ता, लेकिन इलाज का पूरा खर्च कंपनी उठाती।
क्या करें?
- फॉर्म भरते समय हर सवाल का ईमानदारी से जवाब दें।
- मेडिकल टेस्ट या रिपोर्ट्स छुपाने की गलती न करें।
- स्मोकिंग, शराब या किसी पुरानी बीमारी की जानकारी साफ-साफ लिखें।
- अगर कोई गलती हो गई है, तो तुरंत कंपनी को अपडेट करें।
इंश्योरेंस कंपनियां भी अब डिजिटल वेरिफिकेशन और मेडिकल रिकॉर्ड्स के जरिए जानकारी चेक करती हैं। ऐसे में झूठ बोलना पहले से कहीं ज्यादा जोखिम भरा हो गया है।
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